भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर के बढ़ते कद से बीएसपी और मायावती को हो रहा है नुकसान?

क्या सीएए और एनआरसी के विरोध में हुए प्रदर्शनों से बीएसपी और मायावती को नुकसान हो रहा है? ये सवाल इसलिए क्योंकि इन प्रदर्शनों में भीम आर्मी की भी भूमिका रही है और बड़ी संख्या में दलितों का झुकाव भीम आर्मी की ओर देखने को मिला है.

दलितों में सीएए और एनआरसी को लेकर भ्रम का माहौल

जब से सरकार ने नया नागरिकता संशोधन कानून लागू किया है तभी से दलित समुदाय में घबराहट देखी जा रही है. व्हाट्सएप समेत अन्य सोशल मीडिया के जरिए उन तक जो मैसेज पहुंच रहे हैं वो उन्हें डरा रहे हैं. सरकार की ओर से भी सीएए और एनआरसी को लेकर कुछ बहुत स्पष्ट नहीं कहा गया है लिहाजा ये डर बढ़ता जा रहा है.

सीएए और एनआरसी के विरोध में मुसलमान सड़क पर

मुसलमानों का एक तबका साफ तौर पर सीएए के खिलाफ सड़कों पर उतर आया है. जगह-जगह रैलियां हो रही हैं और बड़े विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. इन आयोजनों में काफी पैसा भी खर्च हो रहा है. इस पूरे प्रकरण के दौरान कई ऐसे लोग उभरे हैं जिन्हें इस कथित आंदोलन का चेहरा माना जा सकता है.

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर भी बने विरोध का चेहरा

भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर पिछले कुछ वक्त में एक जाना पहचाना नाम बन गए हैं. उन्होंने मुखर होकर सीएए के खिलाफ आवाज उठाई और मुसलमानों के साथ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया. उनके फेसबुक पेज को देखने से साफ है कि उन्होंने इस काम का काफी तीखेपन और आक्रमकता के साथ अंजाम दिया.

मायावती की आक्रमकता हुई कम

एक वक्त था जब मायावती को बेहद तीखे तेवरों और आक्रमकता के लिए जाना जाता था. लेकिन बदलते वक्त के साथ साथ मायावती का ये तीखापन कम होता चला गया है. वे ट्वीट तो करती हैं लेकिन उनकी पार्टी ना तो कोई रैली करती नजर आई और ना ही मायावती ने उस तरह रिएक्ट किया जिसके लिए वे जानी जाती हैं.

दलित समाज का नया चेहरा बने चंद्रशेखर?

हालांकि ये कहना अभी जल्दबाजी होगा लेकिन मायावती ने यदि संगठन को लेकर ऐसे ही रुख अपनाए रहा तो आने वाले वक्त में चंद्रशेखर को इसका माइलेज मिल जाएगा. यूपी में दलित समाज बीएसपी और मायावती के प्रति ईमानदार रहा है लेकिन मायावती की ओर से जिस तरह का रिस्पॉन्स मिलना चाहिए था वैसा नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में भीम आर्मी और चंद्रशेखर ने दलित युवाओं के बीच पहचान बना ली है और काफी संख्या में लोग उनसे जुड़ भी रहे हैं हालांकि 35 साल से अधिक उम्र के लोग अभी भी मायावती को ही नेता मान रहे हैं.

मायावती को लगातार मिल रही नाकामयाबी

पहले अखिलेश यादव ने यूपी की सत्ता संभाली और फिर योगी आदित्यनाथ सत्ता में आए. पिछले 8 सालों से मायावती यूपी की सत्ता से दूर हैं. लोकसभा चुनाव में भी उन्हें खास कामयाबी नहीं मिल सकी. धीरे धीरे उनके विश्वासपात्र उनसे दूर हो गए और आज स्थिति ये है कि मायावती का जनाधार भी कम होता दिखाई दे रहा है. दिल्ली, एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीएसपी पांव नहीं जमा पाई है और यूपी में भी भविष्य खतरे में दिख रहा है.