यूपी के बुलंदशहर में ऊपरकोट के नीचे दफन है पुराना किला? काश काली नदी गवाही देती

होली पर घर गया था. घूमने निकला तो बृजवासी की रबड़ी खाई, अंसारी रोड़ और चौक बाजार टहला, नहर पर गया और फिर काली नदी की तरफ पहुंचा. नदी खत्म हो गई है. वापस लौटा हूं तो लैपटॉप खोलकर इसी बारे में लिख रहा हूं. जब मैं छोटा था तो मम्मी के साथ काली नदी पर लगने वाले सालाना मेले में जाता था. मेले को बूढे बाबू की दौज कहा जाता था. मेला अभी भी लगता है लेकिन नदी खत्म हो चुकी है.

ऐसा माना जाता था कि इस नदी में जो नहा लेता है उसे चर्म रोग नहीं होते. जब हम छोटे थे तो नदी में डुबकी लगा लेते थे. थोड़े साल बाद जब नदी का पानी काला और गंदा होने लगा तो हाथ मुंह धोने के लिए कहा जाने लगा. कुछ और सालों के बाद केवल छींटे लगाने को कहा गया. और वक्त बीता तो कहा गया कि केवल इस पानी से टीका कर लो. अब शायद वो भी नहीं होता होगा.

इस नदी की एक कहानी है, इस नदी ने बुलंदशहर को सैकडों सालों से देखा है. कई राजा देखे होंगे, नवाब देखे होंगे, अंग्रेजी शासन देखा होगा और आजाद भारत भी देखा होगा. इसी आजाद भारत में तो नदी ने दम तोड़ा है. इस शहर की कहानी इस नदी की जुबानी मैं आपको बताता हूं. जो हमेशा से देखा सुना है, वो आपको बताता हूं. आखिर इस नदी ने बुलंदशहर का सुनहरा दौर देखा है.

ऐसा कहा जाता है कि इस शहर का नाम ऊंचा नगर था क्योंकि ये थोड़ी ऊंचाई पर बसा था. जब फारसी शासन यहां पहुंचा तो नाम पड़ा बुलंद शहर. फिर मुगल आए. फिर छोटे छोटे जमींदार हुए. फिर अंग्रेजी शासन आया. उसी दौर में गजेटियर लिखा गया था. शहर को लेकर कई अफवाहें भी हैं जिनका सच तो कोई नहीं जानता लेकिन शायद ये काली नदी जरूर सच को जानती होगी.

कहानी शुरू होती है भवन के मंदिर से. ये मंदिर भी बहुत पुराना है. कितना पुराना कोई नहीं जानता लेकिन शायद राजा की कुलदेवी का मंदिर यही होगा. मंदिर से थोड़ी दूरी पर काली का मंदिर है. अखाड़ा है और शमशान भी है. साथ ही अनाज की मंडी है. सड़क पार करते ही आपको सीढ़ियां दिखती हैं. ये नदी का घाट है. यहां कुछ मकानों पर रिवर व्यू भी लिखा है. साफ पता चलता है कि किसी जमाने में यहां नदी बहुत साफ रही होगी.

आज यहां भैंस बंधी दिखती हैं, कुत्ते घूमते दिखते हैं और नदी पर हुआ कब्जा साफ साफ देखा जा सकता है. इसके बराबर में ही कबाड़ी बाजार है जहां लोहे का सामान मिलता है. ऐसा लगता है जैसे यहां राजा के दौर में हथियार बनाए जाते होंगे.

इसी से सटा है कसाईबाड़ा, गौर से देखने पर यहां एक गेट दिखाई देता है. ये कितना पुराना है नहीं पता. थोड़ा और आगे बढ़ने पर राम मंदिर है जो काफी प्राचीन है. इस मंदिर के ठीक सामने हनुमान मंदिर है. यहीं शहर का सबसे पुराना बाजार है- अंसारी रोड. गौर से देखिए तो पैटर्न वही है जो लाल किले का है. लाल किले के ठीक सामने मीना बाजार है. ठीक इसी तरह यहां महिलाओं के कपड़ों और प्रसाधनों की दुकानें हैं.

हो सकता है यहां महल का मुख्य द्वार रहा हो. जिसके सामने बाजार हो. मेन गेट पर राम मंदिर और ठीक सामने हनुमान मंदिर. थोड़ा और आगे बढ़ने पर एक अंग्रेजी इमारत आती है. कहते हैं अंग्रेजी शासन यहीं से चला करता था. आगे बढ़ने पर साठा आ जाता है. यहीं पर एक गेट और है. ये गेट भी काफी पुराना है. यहां पुलिस चौकी भी है. शायद यहां भी किले का कोई गेट रहा होगा.

क्या पता किले की चौकी रही होगी. थोड़ा और आगे बढ़ने पर भूतेश्वर महादेव  का मंदिर आ जाता है. ये मंदिर भी बहुत पुराना है. खास बात ये है कि ये सब काली नदी के किनारे किनारे बसे हैं. आज इस पूरे इलाके पर बसा है ऊपरकोट. कोट का अर्थ होता है किला यानि ऊपरकोट का अर्थ हुआ ऊंचा किला.  ऐसा भी कहा जाता है कि राजा का महल ऊपरकोट वर्तमान ऊपरकोट के नीचे दफन है.

पुराने लोग अब बचे नहीं है लेकिन बताने वाले बताते हैं कि 1970 तक काली नदी में बाढ़ आया करती थी और साठा समेत कई इलाकों में पानी भर जाता था. नावें चला करती थीं. शहर का दायरा बढ़ा तो नदी को समेट दिया गया. नदी की जमीनों पर कब्जे कर लिए गए. प्लॉटिंग कर दी गई. नदी की जमीनों पर खेती हो रही है. कौन कर रहा है पता नहीं. ना शासन को चिंता है, ना प्रशासन को चिंता है.

काली नदी अब काले नाले में तब्दील हो गई है. नालों की तो कभी कभार सफाई भी हो जाती है लेकिन काली नदी की सफाई भला कौन सा विभाग करेगा? तमाम तेज तर्रार डीएम बुलंदशहर आते है. कोई सिंघम होता है, कोई दबंग होता है. सोशल मीडिया पर नाम कमाते हैं, फिर एक दिन तबादला पाकर चले जाते हैं.

तमाम विधायक आए और गए लेकिन काली नदी कभी किसी की प्राथमिकता में नहीं रही. बुलंदशहर के वर्तमान और पिछले कई सांसद भी काली नदी के लिए कुछ नहीं कर पाए. एक दिन शायद वो आएगा जब काली नदी किसी किस्से कहानी तक में नहीं मिलेगी. शायद कभी नदी किनारे लगने वाला मेला बंद हो जाएगा. शायद कभी किसी को याद भी नहीं रहेगा कि काली नदी नाम की कोई नदी इस इलाके से बहा करती थी.

या फिर कभी ऐसा होगा कि शासन और प्रशासन मिल कर इस नदी को पुनर्जीवित करने का काम करेंगे. सांसद और विधायक के लिए ये नदी प्राथमिकता बनेगी, डीएम के लिए उसकी साख का सवाल बनेगी. जनता के लिए उसकी शान बनेगी और शायद किसी दिन अवैध कब्जे से इस नदी को मुक्त करा लिया जाएगा. शायद किसी दिन ऐसा हो कि फिर से बच्चे इस नदी में डबुकी लगा पाएं, फिर से मां की उंगली पकड़ कर मेले में जा पाएं. शायद किसी दिन ऐसा हो…..