बुलंदशहर: सुदीक्षा भाटी के साथ छेड़खानी हुई थी या फिर सड़क दुर्घटना?

मुझे याद है जब शिव नादर, रोशनी नादर और कपिल देव बुलंदशहर आए थे और विद्याज्ञान स्कूल की शुरूआत की थी. बतौर पत्रकार मैं इस इवेंट को कवर करने पहुंचा था. स्कूल ऐसे बच्चों के लिए उम्मीद कि किरण था जो पढ़ने में अच्छे तो हैं लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. बाद में शिव नादर ने पास ही गौतमबुद्ध नगर के दादरी में यूनिवर्सिटी भी खोल दी और गरीब बच्चों के लिए दुनिया का रास्ता खुल गया था. सुदीक्षा भाटी भी ऐसे ही बच्चों में से एक थी जो इस स्कूल से पढ़ी थी और अमेरिका पहुंची थी.

अब सुदीक्षा इस दुनिया में नहीं है. वो अमेरिका से आई हुई थी अपने परिवार के पास लेकिन उसे ये थोड़े ही पता था कि वो अब अपने सपनों को पूरा करने के लिए वापस नहीं लौट पाएगी. परिवार का दावा है कि लड़की के साथ छेड़खानी हुई थी और उसी कारण उसकी जान चली गई. वहीं पुलिस और प्रशासन का कहना है कि मामला सड़क दुर्घटना का है. मीडिया के लिए ये एक तात्कालिक खबर है और कुछ देर में पूरा देश जन्माष्टमी के रंग में रंग जाएगा और इस घटना को भूल जाएगा. अगर किसी के जेहन में ये हादसा रह जाएगा तो वो होगा सुदीक्षा का परिवार.

कुछ वक्त पुरानी ही बात है जब मेरे एक पत्रकार मित्र की बहन के साथ छेड़खानी की घटना हुई थी. वो लड़की आज भी बिस्तर से उठ नहीं पाती है. बहुत वक्त तो उसने मौत से जंग लड़ी और उसके परिवार के लाखों रुपये खर्च हो गए. उसके पिता ने आज बताया कि किस तरह सिस्टम ने छेड़खानी की वारदात को मामूली घटना में तब्दील कर दिया और इंसाफ आज तक नहीं मिल पाया. जो लड़की कॉलेज से घर लौट रही थी उसे मौत के मुंह में पहुंचा दिया गया और आरोपी साफ बच गए.

बहुत पुरानी बात नहीं है जब टीवी चैनलों पर वैलेंटाइन का विरोध करने वाले डंडे हाथ में लेकर घूमते दिखाई देते थे. पुलिसवाले पार्कों में प्रेमी जोड़ों को पकड़ते दिखते थे. यूपी सरकार ने तो एंटी रोमियो स्क्वायड तक भी बनाया था. हर शहर में महिला थाना भी है, महिला हेल्पलाइन, एनजीओ, सामाजिक कार्यकर्ता, और भी ना जाने क्या क्या और कौन कौन. लेकिन क्या इस सबके बावजूद भी महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं.

सरकार कोई भी हो, सत्ता किसी के भी हाथ में हो, कितने भी सख्त आदेश हों, कितने भी एनकाउंटर होते हों लेकिन छेड़खानी करने वालों के हौसले हमेशा बुलंद रहे हैं. चाहे यूपी का उन्नाव कांड हो या फिर शाहजहांपुर कांड. चाहे बदायूं वाला मामला हो या फिर बुलंदशहर का ही हाइवे रेप कांड. वक्त कोई भी रहा हो लेकिन महिलाओं के लिए डर ही एक सच है. आज भी शाम होते ही महिलाएं बाजार जाने से परहेज करती हैं, रात में निकलने से डरती हैं और बाजारों से रात होते होते रौनक गायब हो जाती है.

आप बचने वाली महिलाओं को कभी एसिड अटैक सर्वाइवर का नाम दे देते हैं और कभी उन्हें निर्भया कह देते हैं लेकिन सच क्या है जरा खुद से पूछिए? कितनी लड़कियों के साथ रेप होते हैं? कितने मामले दर्ज हो पाते हैं? उनमें से कितनों को इंसाफ मिल पाता है? इंसान की चप्पलें घिस जाती हैं चौकियों और थानों के चक्कर लगाते लगाते. उसके बाद कोर्ट की चौखटों पर जाते जाते. अधिकतर मामलों के अंत में इंसान हिम्मत हार जाता है और आरोपी हंसते हुए बरी हो जाते हैं. सुदीक्षा के मामले में तो अभी से पुलिस मान चुकी है कि मामला सड़क दुर्घटना का है.

सुदीक्षा का भाई और चाचा चाहे जो कहें और करें उनकी लड़ाई तो अब शुरू होगी जब मीडिया अपनी ओबी लेकर वापस दिल्ली लौट चुकी होगी और अखबार केवल तारीखों और फैसलों की ही खबरें छापेंगे. तब उन्हें इस निर्दयी सिस्टम से अकेले ही लड़ना होगा. तब उन्हें मीडिया के नहीं बल्कि पुलिस के सवालों के जवाब देने होंगे. सैकडों लोग समझाएंगे कि अब बेटी तो चली गई, बेटे को क्यों उलझा रहे हो, वो बताएंगे कि उन्हें क्या करना चाहिए. तब उन्हें उस बुलेट मोटरसाइकिल की याद आएगी जिसके कारण सुदीक्षा ‘सड़क दुर्घटना’ का शिकार बन गई.