क्या कोरोना वायरस को वाकई हरा सकता है गोमूत्र? गोमूत्र पार्टी से आखिर किसे फायदा?

एक खबर पढ़ी जिसमें बताया गया था कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए गोमूत्र पार्टी का आयोजन किया गया. आयोजन दिल्ली में किया गया था और कई पत्रकारों को भी इसमें आमंत्रित किया गया था. थोड़े वक्त में ही खबर वायरल हो गई. विदेशी मीडिया ने भी इस खबर को चटकारे लेकर छापा. आयोजन करने वाली संस्था के नाम में ‘हिन्दू’ शब्द है लिहाजा सवालों के घेरे में हिन्दू हैं जिनको विदेशी लोग गोमूत्र पीने वाला समझ रहे हैं.

गोमूत्र के कथित फायदों से डॉक्टरों का इंकार

अक्सर गोमूत्र के फायदों को लेकर कई तरह के दावे सामने आते रहते हैं लेकिन इनका वैज्ञानिक आधार क्या है? कुछ नहीं. जी हां, इन दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. डॉक्टरों ने कभी ऐसा नहीं कहा कि गोमूत्र से कोई औषधीय फायदा होता है. अगर वाकई ऐसा होता तो हजारों तरह की रिसर्च इस पर की जा चुकी होती. सोचिए जरा कि हजारों लाखों करोड़ खर्च करके अस्पताल बनाए जाते हैं और अरबों रुपये रिसर्च आदि में खर्च किए जाते हैं, क्या वो सब बेकार या फिजूल है? अगर गोमूत्र गंभीर बीमारियों के इलाज में सक्षम होता तो क्यों इतना पैसा खर्च किया जाता?

 

गाय का हिंदुओं से सनातन संबंध है

इस तथ्य में कोई शक नहीं कि गाय का हिंदुओं से सनातन संबंध है. गाय दूध देती है जिससे दही, मक्खन और घी बनता है. गाय के गोबर से उपले बनते हैं जो इंधन के काम आते हैं. अगर बच्चे को मां का दूध नहीं मिल पाता तो डॉक्टर गाय के दूध की सलाह देते हैं. शायद इसीलिए गाय की तुलना मां से की गई और उसे गौमाता की उपाधि दे दी गई. गाय को कामधेनु भी कहा गया है यानि जो इच्छाओं की पूर्ति करती हो. जिस वक्त उसे ये उपाधि दी गई उस वक्त मनुष्य के लिए इंधन व खाद्य पदार्थ सबसे अधिक महत्वपूर्ण थे. शायद इसीलिए गाय को ये उपाधि दी गई होगी. गाय को धर्म से अलग करके सोचिए तो मामला थोड़ा साफ होगा कि जो प्राणी मनुष्य के इतने काम आता होगा वह शनै-शनै इतना महत्वपूर्ण हो गया कि उसे पवित्र मान लिया गया.

 

हमेशा से प्रकृति पूजक रहे हैं हिंदू  

वैसे भी हिंदुओं ने हर उस चीज को पूज्यनीय माना जो उसके काम आती थी. किसानों के लिए बैल और हल व सिपाहियों के लिए उनके अस्त्र-शस्त्र पूज्यनीय रहे हैं. इंसान को चांद ने शीतलता दी तो उसे पवित्र माना, सूरज ने गर्मी और रौशनी दी तो उसे पवित्र माना, नदियों ने पीने और सिंचाई के लिए पानी दिया तो उसे पवित्र माना, आग ने रक्षा की और पाक कला में सहायक बनी इसलिए उसे भी पवित्र माना गया. गांवों में जाकर देखेंगे तो वहां कुएं की पूजा तक का रिवाज है और वो इसलिए कि कुएं को पवित्र माना जाता है और चूंकि कुएं की पूजा होती है इसलिए उसे साफ रखा जाता है. सवाल उठ सकता है कि क्या जानवरों में सिर्फ गाय की ही पूजा होती है? तो जवाब है नहीं हमारे यहां तो कौए से लेकर कुत्ते तक और घोड़े से लेकर सांप तक की पूजा होती है.

 

गोमूत्र पार्टी जैसे आयोजनों से हासिल क्या होगा?

गोमूत्र पार्टी जैसे आयोजनों से आखिर क्या हासिल होता है? आयोजन कराने वाली संस्था को प्रचार हासिल होता है, चर्चा मिलती है, अखबारों में तस्वीरें छपती हैं और टीवी पर 5-7 मिनट की फुटेज मिल जाती है. इसीलिए इस तरह के आयोजन कराए जाते हैं. ना तो इस आयोजन से कोरोना खत्म हो सकता है और ना ही सड़कों पर घूमती गायों को आश्रय मिल सकता है. सोचने वाली बात ये भी है कि कोरोना के कारण लोगों को किसी भी तरह के आयोजनों से बचने की सलाह दी गई है और ऐसे में लोगों को बुलाकर ऐसे आयोजन करने को कैसे तर्कसंगत माना जाए? दूसरी बात ये कि अगर गायों के बारे में कुछ करना है तो गौशालाओं की मदद करनी चाहिए और गाय का दूध खरीदना चाहिए, ऐसे आयोजनों से गाय का भी कुछ भला होता नहीं दिखता है.