कोरोना कमांडोज़ को सम्मान देने में आखिर बुराई क्या है? कौन लोग इसके खिलाफ हैं

चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ कोरोना वायरस अब पूरी दुनिया के करीब 170 देशों में फैल चुका है. WHO के मुताबिक करीब तीन लाख लोग इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं. 12700 से अधिक लोग इस वायरस के कारण अपनी जान गवां चुके हैं. यानि ये बात पूरी तरह साफ और स्पष्ट है कि महामारी की ये स्थिति बेहद गंभीर है. ऐसे में कुछ लोग अपनी जान की चिंता किए बगैर दिन और रात काम कर रहे हैं.

डॉक्टर और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोग ना तो अपने ऑफ की चिंता कर रहे हैं और ना ही शिफ्ट की. ये लोग लगातार काम कर रहे हैं और कोरोना से पीड़ित लोगों की जान बचाने में जुटे हैं. पुलिस और रक्षा सेवाओं से जुड़े लोग भी अपना काम कर रहे हैं. परिवहन सेवाओं से जुड़े लोग भी लगातार काम कर रहे हैं. सफाईकर्मी भी ऐसी स्थिति में और अधिक काम कर रहे हैं. इनके अलावा पत्रकार और मीडियाकर्मी भी अपनी जान को जोखिम में डाल कर काम करते नज़र आ रहे हैं.

वो तमाम लोग जो कोरोना वायरस के संक्रमण काल में काम कर रहे हैं यकीनन तारीफ के हकदार हैं. ऐसे हालातों में जब पूरी दुनिया अपने घरों के अंदर हैं, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो काम के लिए बाहर निकले हुए हैं ताकि सिस्टम चलता रहे, देश और दुनिया चलती रहे. आपातकालीन सुविधाओं से जुड़े ये लोग क्या तारीफ के हकदार नहीं हैं? क्या इनका शुक्रिया अदा करना गलत है? क्या इनके लिए तालियां बजा देना गलत है? सोशल मीडिया पर नजरें दौड़ाइए तो ऐसे लोगों की कमी नहीं जो तालियां बजाने को गलत बता रहे हैं.

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा था कि ऐसे कोरोना कमांडोज को शुक्रिया कहने के लिए घरों की बॉलकॉनी से तालियां बजाएं, थालियां बजाएं. इस पर देश के तमाम लोगों ने तालियां बजाईं, तमाम लोगों ने थालियां बजाईं, शंख बजाए और भी कई तरह की आवाजें कीं और कोरोना कमांडोज़ को अपने अपने स्टाइल में थैंक्यू कहा.

हालांकि कुछ लोग ऐसे भी रहे जिन्होंने इस थैंक्सगिविंग को समारोह में तब्दील कर दिया. जश्न और उत्सव बना दिया. ट्विटर और फेसबुक पर नजर डालिए तो ऐसे लोगों की कमी नहीं जो सड़कों पर निकल आए. नाचते और गाते हुए निकल पड़े. ऐसे लोगों ने ना केवल प्रधानमंत्री की सोशल डिस्टेंसिंग की बात को नकार दिया बल्कि अपने-अपने घरों में रहने की उनकी अपील को भी नहीं माना. इन लोगों ने जो किया है उसे कतई भी ठीक नहीं कहा जा सकता है.

पीलीभीत के जिलाधिकारी और एसएसपी को देखिए जिन्होंने तमाम दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया-

कई और जगहों पर भी भीड़ सड़कों पर उतरी और कोरोना वायरस के संक्रमण काल में जब सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना चाहिए था तब झुंड बनाकर जश्न मनाया. ये लोग वाकई दोषी हैं और इन पर आईपीसी की धारा 188 के तहत कार्रवाई भी हो सकती है. आपको बता दें कि लॉकडाउन की कार्रवाई एपीडेमिक डिजीज एक्ट के तहत की जा रही है और उल्लंघन करने वाले पर जुर्माना और जेल दोनों हो सकती हैं.

लेकिन जो लोग प्रधानमंत्री की थाली और ताली बजाने की अपील पर सवाल उठा रहे हैं क्या वो लोग कोरोना कमांडोज की अनदेखी नहीं कर रहे हैं? राजनीतिक विरोध अपनी जगह पर है, वो करिए, दम लगाकर करिए, सरकार को कमियां बताइए लेकिन जो लोग आपकी जान के लिए अपनी जान को दांव पर लगाते हैं उनके प्रति कृतज्ञता जताना मत भूलिए.

हो सकता है कि आपका तरीका अलग हो, आपको ताली और थाली बजाना पसंद नहीं तो मत बजाइए लेकिन अपने तरीके से उन लोगों को शुक्रिया जरूर बोल दीजिए जो लोग इस संकट की घड़ी में कोरोना वायरस से सीधी टक्कर ले रहे हैं. ऐसे में हम और आप अपने घरों में हैं वो लोग कोरोना की आखों में आखें डाल कर खड़े हैं, बिना घबराए ताकि हम और आप सुरक्षित रह सकें.

सवाल उठ सकता है कि क्या ये तालियां केवल भारत में ही बजाई गईं थीं? क्या किसी और देश मे भी ऐसा किया था? थोड़ा गूगल करेंगे तो साफ हो जाएगा कि दुनिया के और देशों ने भी इमरजेंसी सेवाएं देने वालों को सम्मान देने के लिए तालियां बजाई थीं.

अब सीएनएन की इस खबर को देखिए. अमेरिका, ब्राजील, इजराइल समेत दुनिया के कई देश अपने कोरोना फाइटर्स को इसी तरह सम्मान दे रहे हैं और ऐसे में भारत के लोगों ने ऐसा कर दिया तो क्या गलत किया? ये वक्त एकजुटता दिखाने का है और मिल कर कोरोना से मुकाबला करने का है. हमारी एक गलती हमें और हमारे अपनों को काफी भारी पड़ सकती है.

सरकार को हर वो कदम उठाना चाहिए और इस महामारी से लड़ने के लिए जरूरी है. लेकिन हम लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए. जो लोग भी घरों से निकल रहे हैं. बसों, ट्रेनों या फिर अन्य सार्वजनिक वाहनों से यात्रा कर रहे हैं. भीड़ लगा रहे हैं. जमाखोरी कर रहे हैं. अपने घरों में राशन भर रहे हैं. कोरोना के लक्षण दिखने के बाद भी चेकअप से बच रहे हैं ये तमाम लोग इस महामारी के वक्त में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं. वो जिम्मेदारी जो सभ्य समाज के नागरिक को निभानी चाहिए.