पत्रकारिता पर सवाल उठाने से पहले इन बातों को भी जान लीजिए जरा

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आज देश अर्नब गोस्वामी के बारे में बातें कर रहा है क्योंकि उन्होंने एक राष्ट्रीय पार्टी की महिला अध्यक्ष पर बेहद निजी हमला किया है. उन्होंने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है उसे सभ्य नहीं कहा जा सकता है. लेकिन इसके बाद अर्नब पर हमला किया गया और उनके खिलाफ कई केस दर्ज करा दिए गए. साथ ही सोशल मीडिया पर उस पार्टी से जुड़े लोग भी असभ्य भाषा का इस्तेमाल अर्नब के लिए कर रहे हैं. इस सबके बीच अर्नब गोस्वामी सोशल मीडिया पर छा गए, सभी उनके बारे में बातें करने लगे, आधे लोग उन्हें गलत बता रहे हैं और आधे लोग उन्हें सही ठहरा रहे हैं. लेकिन सवाल यहां अर्नब गोस्वामी का नहीं है, सवाल मीडिया की साख का है.

वैसे तो मीडिया हमेशा से सवालों के घेरे में रही है. हमेशा पक्षपात के आरोप मीडिया और पत्रकारों पर लगते रहे हैं. लेकिन पिछले एक दशक में जैसा माहौल बना है वैसा उससे पिछले दशक में नहीं था. टीवी चैनल बहुत तेजी से बढ़े और फिर डिजिटल मीडिया उससे भी अधिक तेजी से बढ़ा. लेकिन सोशल मीडिया जितना तेजी से बढ़ा, उतनी तेजी कभी देखी सुनी नहीं गई थी. रेडियो और अखबार के बाद आए टीवी, डिजिटल मीडिया और अब सोशल मीडिया ने बहुत तेजी से अपने पैर पसारे. हजारों लोगों को रोजगार दिया लेकिन धीरे धीरे उस विशवसनीयता पर सवाल उठने लगे जिसे पत्रकारिता कहा जाता था.

एक मीडिया संस्थान खोलने में करोड़ों रुपये का खर्चा आता है. कम से कम 50 रिपोर्टर और सैंकडों स्ट्रिंगर, 100 से अधिक डेस्क के लोग और करीब इतने ही अन्य कर्मचारी, इसके बाद तकनीकी विभाग के लोग, HR और एडमिन के लोग, सेल्स और मार्केटिंग के लोग, ऑफिस का खर्चा, साथ में और भी तमाम खर्चे हर महीने मुंह खोले खड़े रहते हैं. ये खर्चा निकलता है विज्ञापनों से और विज्ञापन मिलता है उद्योगपतियों से. अधिकतर उद्योगपति किसी ना किसी पार्टी के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं. ये केवल टीवी की बात नहीं है, अखबार से लेकर रेडियो तक और डिजिटल मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक के साथ यही समस्या है.

हर साल कर्मचारियों को इंक्रीमेंट चाहिए, दर्शकों को नया कंटेंट चाहिए, स्टिंग ऑपरेशन से लेकर ड्रोन की शूटिंग तक देखना चाहते हैं लोग, फिल्मी सितारों के इंटरव्यू से लेकर पर्यटन और फूड शो तक देखना चाहते हैं लोग, सास बहू से लेकर शमशान की रात तक देखना चाहते हैं लोग लेकिन उन्हें ये सब फ्री में देखना है. मनोरंजन चैनल तो टीवी पर 5 से लेकर 15 रुपये महीना है लेकिन न्यूज़ चैनल फ्री है. एक-आध कोई एक या दो रुपया तक लेता है लेकिन लोग उसे अनसब्सक्राइब कर देते हैं. सोचते हैं, मोबाइल पर देख लेंगे, यूट्यूब से लेकर सौ माध्यम हैं मोबाइल पर देखने के. खबर देखने के भला कैसे पैसे.

एक अखबार की कीमत 25 से 30 रुपये तक होती है लेकिन बिकता है 2 से 3 रुपये में. वेबसाइट फ्री में पढ़ी जाती है. यूट्यूब से लेकर फेसबुक तक पर फ्री में वीडियो देखे जाते हैं. यानि जनता खबर के लिए पैसा ना देती है, ना देना चाहती है. इसके बाद जनता को खबर भी चाहिए और खबर की धार भी चाहिए. सच भी चाहिए, तेवर भी चाहिए, डंके की चोट पर भी चाहिए, सबसे पहले सबसे तेज भी चाहिए. लेकिन कोई मीडिया की परेशानी ना तो समझता है और ना ही समझना चाहता है.

अब आखिर मीडिया संस्थान पैसा लाएं तो कहां से. एक दो मीडिया हों तो बाजार से विज्ञापन मिले. मीडिया वाले भी हजार हैं. अखबार को विज्ञापन दो तो टीवी वाले आएंगे, टीवी को दो तो डिजिटल वाले आएंगे, रेडियो वाले आएंगे, सोशल मीडिया वाले आएंगे. आखिरकार बाजार भी निष्ठुर हो जाता है. विज्ञापन बंद कर देता है. ऐसे में या तो मीडिया संस्थान बंद हो जाते हैं या फिर समझौता करने के लिए मजबूर. समझौता करना पड़ता है बाजार से, समझौता करना पड़ता है कंटेंट से, समझौता करना पड़ता है पत्रकारिता के ऊसूलों से. सैलेरी मिलेगी तभी तो घर चलेगा पत्रकार का.

हर साल हजारों बच्चे पत्रकारिता की पढ़ाई करके निकलते हैं उनको नौकरियां चाहिए, पुराने पत्रकारों को सैलेरी बढ़ानी है क्योंकि घर चलाना है, लेकिन मीडिया इंडस्ट्री बाकी इंडस्ट्री की तरह कुछ सामान नहीं बनाती जिसे बेच कर पैसा कमाया जा सके. वो कंटेट बनाती है जिसे जनता खरीदने के काबिल नहीं समझती. अब ऐसे में मीडिया इंडस्ट्री के सामने समझौता करने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं बचता. अब पत्रकारिता शब्द की जगह एक नए शब्द का इस्तेमाल किया जाता है और वो है न्यूज़ बिजनेस. अब न्यूज़ एक बिजनेस है और बिजनेस में मुनाफा महत्वपूर्ण है ना कि सही और गलत.

ये न्यूज़ बिजनेस चलता है तभी हजारों पत्रकारों का घर चलता है. 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1 लाख 18 हजार से ज्यादा अखबार छपते हैं भारत में. 2016 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 900 के करीब टीवी चैनल हैं जिनमें से 400 से अधिक समाचार और करंट अफेयर्स के चैनल हैं. वेबसाइटों की तो कोई गिनती ही नहीं और सोशल मीडिया के दौर में हर कोई खुद को पत्रकार समझने लगा है. न्यूज़ और फेक न्यूज़ के बीच का फर्क ही खत्म हो गया है. मोटे तौर पर समझिए कि देश में अखबारों के पत्रकारों की संख्या 12 लाख से कम नहीं है और टीवी पत्रकारों की संख्या 40 हजार से कम नहीं है. इनमें हमने स्ट्रिंगर तो जोड़े ही नहीं हैं जिनको पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी माना जाता है.

अब इन 12 लाख 40 हजार को औसत सैलेरी 10 हजार भी मिलती हो तो गुणा कर लीजिए कि कितनी बड़ी इंडस्ट्री चल रही है. कितने अरब का खर्चा है. अब ये पैसा आए तो आए कहां से. अगर जनता ये पैसा नहीं देगी तो कौन देगा? अगर बाजार विज्ञापन नहीं देगा तो कौन देगा? मीडिया को गोदी मीडिया कहना तो आसान है, सवाल उठाने आसान हैं लेकिन समझ तो लीजिए कि मीडिया के लिए सर्वाइवल कितना कठिन है. आप लोग अपनी विचारधारा के आधार पर एक पक्ष के पत्रकारों को अच्छा और दूसरे पक्ष के पत्रकारों को बुरा कहते हैं. सवाल सिर्फ इतना है कि कौन किसकी गोदी में है.

आज सवाल अर्नब का नहीं है, आज सवाल पत्रकारिता का है लेकिन आप सवाल तभी कर सकते हैं जब आप अपनी जेब से पैसे देकर खबर जानना चाहें, जब आप 50 रुपये का अखबार खरीदने को तैयार हों, जब आप खबरिया चैनल का मासिक सब्सक्रिप्शन लेने को तैयार हों, जब आप रेडियो सुनने का पैसा देने को तैयार हों और जब आप वेबसाइट को हर महीने पैसा दें, जब आप सोशल मीडिया के लिए पैसा चुकाएं, पत्रकारिता और मीडिया पर सवाल तभी करें जब जेब से पैसा देने को तैयार हों वरना आपके सवाल का कोई अर्थ ही नहीं है.