भारत पर नजर रखने के लिए चीन ने लॉन्च किया नया नेवीगेशन सिस्टम?

चीन ने अपने नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम बाइडू को और भी अधिक शक्तिशाली बना लिया है. इसको बाइडू-3 नाम दिया गया है. माना जा रहा है कि इस नई तकनीक का सीधा मुकाबला अमेरिका की जीपीएस तकनीक के साथ होगा. 1980 के दशक से अमेरिका इस सर्विस को दुनिया में फ्री में उपलब्ध करा रहा है.

चीन का ये नेवीगेशन सिस्टम पाकिस्तान में तो काम कर ही रहा है, अब चीन की योजना है कि जो देश चीन के बेल्ड एंड रोड इनीशिएटिव के साथ जुड़े हुए हैं वो भी इसी सिस्टम को इस्तेमाल करें. चीन का ये नया सिस्टम सैटेलाइट नेटवर्क को इस्तेमाल करके बेहद सटीक लोकेशन बता सकता है.

इसकी सटीकता 10 मीटर तक बताई जा रही है जबकि जीपीएस की सटीकता करीब 2.2 मीटर मानी जाती है. चीन ने बाइडू को 1994 में शुरू किया था और अब चीन में इसी को इस्तेमाल किया जाता है.

बाइडू के मुताबिक अब ना केवल सटीक पोजीशन जानी जा सकेगी बल्कि बढ़िया नेवीगेशन भी मिलेगा और साथ ही ये एसएमएस सेवाएं भी अपलब्ध करा सकता है. घोषणा में बताया गया कि 55वां और फाइनल जियोस्टेशनरी सैटेलाइट जिसे 23 जून को लॉन्च किया गया था वो सटीकता के साथ काम कर रहा है.

एपी की एक रिपोर्ट में बताया गया कि ये सैटेलाइट बाइडू की सर्विस बेहतर बनाने के लिए तीसरा प्रयास है इसलिए इस सिस्टम को बाइडू-3 कहा जाता है. आपको बता दें कि 1980 के दशक में चीन ने इस प्रोजेक्ट की शुरूआत की थी.

साल 2000 तक बाइडू चीन भर में अपनी सेवाएं देने लगा था और साल 2012 तक एशिया प्रशांत इलाके में सर्विस देने लगा था. यानि पहले चीन में, फिर एशिया प्रशांत में और अब तीसरे चरण में पूरी दुनिया में ये अपनी सर्विस देने में सक्षम हो गया है.

चीन के मुताबिक बाइडू का इस्तेमाल वो रक्षा, परिवहन, कृषि, मछली पालन और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में भी कर रहा है. चीन का दावा है कि उसका सिस्टम अमेरिका के जीपीएस से भी अधिक सटीक जानकारी देता है.

ऐसा नहीं है कि केवल अमेरिका और चीन के पास ही नेवीगेशन सिस्टम हैं. रूस के पास ग्लोनास नाम का सिस्टम है और यूरोपीय संघ के पास गैलेलीयो नाम का नेवीगेशन सिस्टम है. चीन दुनिया भर को कवर करने वाला चौथा सिस्टम बना चुका है और भारत भी इस दौड़ में खासा पीछे नहीं है.

भारत के पास नाविक नाम का एक क्षेत्रीय नेवीगेशन सिस्टम है. कारगिल युद्ध के बाद से भारत ने इस तकनीक पर काम करना शुरू किया था और अब नाविक काफी हद तक सक्रिय स्थिति में है. ये भारतीय उपमहाद्वीप के 1500 किलोमीटर के दायरे को कवर करता है और अब इसे बेहतर बनाने पर काम किया जा रहा है.

ऐसा माना जा सकता है कि चीन का ये प्रयास सीधे तौर पर अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती है. गौरतलब है कि दुनिया की सभी ग्लोबल नेवीगेशन प्रणालियों में से जीपीएस का इस्तेमाल सबसे अधिक किया जाता है. अब यदि चीन की नेवीगेशन प्रणाली को लोगों ने अधिक पसंद किया तो ये बात अमेरिका के लिए चुनौती होगी.

एक दूसरी खास बात ये भी है कि अमेरिका और चीन के बीच जिस तरह तनातनी बढ़ती जा रही है ऐसे में चीन के लिए ये कदम खासा महत्वपूर्ण माना जा सकता है. इससे चीन की सैन्य शक्ति को भी काफी सपोर्ट मिलेगा. साथ ही अगर कुछ देश चीन की इस प्रणाली को अपनाते हैं तो चीन को आर्थिक रूप से भी फायदा होगा.

अगर चीन इस प्रणाली में वो नक्शे दिखाएगा जिनको बाकी देश विवादित मानते हैं तो एक तरह की परेशानी भी पैदा होगी. चीन जिस तरह कुछ इलाकों पर दावा करता है, वो चाहेगा कि इन इलाकों को नक्शे में चीन का हिस्सा दिखाया जाए और इस पर यकीनन विवाद खड़ा हो सकता है. साथ ही जो देश चीन की इस प्रणाली को अपनाएंगे, ये माना जाए कि वो चीन की विस्तारवादी नीति को सपोर्ट कर रहे हैं.

इसके अलावा भारत के लिए भी ये प्रोजेक्ट काफी परेशानी पैदा कर सकता है क्योंकि अब चीन और पाकिस्तान दोनों मिल कर भारत के इलाकों पर आसानी से नजर रख सकते हैं. ऐसी स्थिति से बचने के लिए भारत क्या तरीका अपनाएगा ये भी देखना होगा और साथ ही भारत को भी नाविक के प्रोजेक्ट को तेज करना होगा ताकि चीन की इस चाल का मुकाबला किया जा सके.