कारगिल योद्धा बोला- आज भी अपने देश के लिए मर मिटने को तैयार हूं

(बुलंदशहर से सुमित शर्मा की रिपोर्ट) कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो हमेशा याद रखी जानी चाहिए. ऐसी ही एक कहानी है कारगिल की कहानी. ये कहानी भारतीय सैनिकों की वीरता और पाकिस्तान की कायरता की कहानी है. ये कहानी उन तमाम जांबाज सैनिकों की कहानी है जिन्होंने अपने वतन को अपनी जान से पहले समझा और ये कहानी उन हिन्दुस्तान की कहानी है जिसके पास ऐसे सपूत हैं जो अपने फर्ज को सबसे पहले मानते हैं और हमेशा फर्ज की पुकार के लिए तैयार रहते हैं.

जब जब कारगिल की कहानी बताई जाएगी तब तब जिक्र यशपाल सिंह तेवतिया का भी होगा. यशपाल सिंह 17 जाट रेजीमेंट में तैनात थे. पता चला कि दुश्मन ने भारत मां के सीने पर अपने गंदे पैर रखे हैं तो पूरी बटालियन का खून खौल गया. माइनस 20 डिग्री का तापमान था और दुश्मन ऊंचाई पर बैठा था. उसके लिए फायरिंग करके भारतीय जवानों को निशाना बनाना आसान था.

कई फौजियों की आखों में गोलियां लगीं, कई वीरगति को प्राप्त हो गए, और बचे हुओं के कसम उठा ली कि जब तक दुश्मन को खदेड़ नहीं देंगे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे. ये कहानी जब तेवतिया बताते हैं आखों में नमी आ जाती है, आवाज कांप जाती है और भुजाएं फड़कने लगती हैं.

नत्थूगढ़ी गांव में रहने यशपाल ने इस युद्ध के दौरान अपने दोस्त पड़ोसी गांव के ऋषिपाल डागर को खो दिया. इस बात का दुख उन्हें आज भी है लेकिन इस बात की खुशी भी है कि उनकी बटालियन ने इस शहादत का बदला दुश्मन को नस्तेमाबूद करके लिया था.

इन दिनों यशपाल सेना से रिटायर हो चुके हैं लेकिन एक फौजी भला अपनी ड्यूटी से कभी रिटायर होता है? यशपाल कहते हैं कि जब भी देश को उनकी जरूरत होगी वो हमेशा अपने देश के लिए मर मिटने को तैयार हैं.