Fact Check: क्या अखबार से फैलता है कोरोना वायरस? जानिए सच्चाई

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पूरी दुनिया कोरोना वायरस के खौफ तले जी रही है. भारत में भी कोरोना के कारण लॉकडाउन है. ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना वायरस के कारण भारत समेत पूरी दुनिया के आर्थिक हालात खस्ता हो सकते हैं. हर इंडस्ट्री, हर उद्योग कोरोना के कहर से कांप रहा है. इस महामारी ने एक ऐसी इंडस्ट्री को भी तोड़ कर रख दिया है जिसके बिना लोगों की सुबह नहीं हुआ करती थी. जी हां, हम बात कर रहे हैं अखबारों की.

ऐसा लगता है जैसे देश में कोरोना वायरस से ज्यादा अफवाहें फैल रही हैं और इन्हीं में से एक अफवाह है कि अखबार, घर में कोरोना ला सकता है. दरअसल ये अफवाह इसलिए है क्योंकि अगर किसी चीज पर कोरोना वायरस है और वो चीज आपके घर तक आती है तो आपके घर में ये वायरस घुस सकता है. इसलिए लोग अखबार से भी डरे हुए हैं और लगातार सब्सक्रिप्शन गिरता जा रहा है.

हम आपको इस मामले की पूरी गंभीरता और सच्चाई भी बताएंगे लेकिन उससे पहले आपको बता दें कि अखबार छपता कैसे है और कैसे आप तक पहुंचता है. अखबारों के पास काफी मात्रा में कागज का स्टॉक होता है. ऑटोमैटिक मशीनों के जरिए अखबार छपता है, काटा और मोड़ा जाता है. मशीनें ही अखबार की तह बनाती हैं और पैकेट में बंद भी कर देती हैं. इस पूरे प्रोसेस में कहीं कोई हाथ लगाने की जरूरत तक नहीं पड़ती.

प्रेस से निकल कर ये पैकेट पहुंचते हैं एजेंट के पास जो इन अखबारों को हॉकर्स को देते हैं. इसके बाद ये हॉकर हमारे और आपके घरों तक अखबार पहुंचाते हैं. यानि दो लोग इस अखबार को छूते हैं वो भी ना के बराबर. अगर पैकेट पैक है तो एजेंट बिना छुए ही अखबार हॉकर को दे देते हैं. यानि करीब करीब बना छुए ही अखबार आपको मिलता है. इसके अलावा कोरोना वायरस की गंभीरता को समझते हुए अखबारों को सैनेटाइज भी किया जा रहा है.

अब आपको बताते हैं कि ये मामला कितना गंभीर है. इन दिनों लगातार बड़े नेता, मंत्री, सांसद, विधायक, अधिकारी अपने सोशल मीडिया पर अखबार पढ़ते हुए तस्वीर शेयर कर रहे हैं, आपने देखी भी होंगी. जानते हैं वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? ताकि आप समझ सकें कि अखबार से कोरोना नहीं फैलता. इस वक्त अखबारों की स्थिति काफी खराब है और अधिकतर अखबारों ने अपने पन्ने कम कर दिए हैं. कई जगहों पर तो अखबारों के सर्कुलेशन में 80 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है.

एक वक्त जो अखबार आपस में कंपटीशन रखते थे आज एक मंच पर आ गए हैं. अखबार समझ गए हैं कि खतरा बहुत बड़ा है और उनके लिए मामला सर्वाइवल का भी हो सकता है.

यहां आपको ये बताना जरूरी है कि जो अखबार आपके पास पहुंचता है और आप दो या तीन रुपये में उसे खरीदते हैं वो अखबार 20 से 25 रुपये के बीच का होता है. सरकारी और प्राइवेट विज्ञापनों के कारण अखबार इतने कम दामों में आपको मिल पाता है. अब कोरोना के कारण प्राइवेट उद्योग धंधे भी घाटे में जा रहे हैं और आने वाले वक्त में अखबारों को मिलने वाले प्राइवेट विज्ञापनों पर भी काफी असर पड़ सकता है.

ऐसे में अखबारों के लिए बहुत कठिनाई पैदा हो सकती है. हो सकता है अखबार कॉस्ट कटिंग पर विचार करें और काफी लोगों की नौकरी इस वजह से चली जाए. हो सकता है अखबार की कीमतें बढ़ जाएं. हो सकता है कि छोटे अखबार इस बोझ को सहन ही ना कर पाएं और बंदी के कगार पर पहुंच जाएं. और ये सब एक मामूली सी गलतफहमी के कारण. वो गलतफहमी जो शायद आपके व्हाट्सएप के जरिए आप तक पहुंची होगी.

अब सबसे जरूरी बात. कोरोना वायरस किस सतह पर कितनी देर तक रुकता है. इस बात को हमने हर जगह तलाश किया. हमें पता चला कि स्टील और प्लास्टिक पर कोरोना वायरस दो से तीन दिनों तक बना रह सकता है जबकि तांबे पर ये वायरस 4 घंटे की रह पाता है. इसके अलावा गत्ते, अखबारी कागज और कपड़ों पर कोरोना वायरस बड़ी मुश्किल से टिक पाता है क्योंकि इनकी खुरदुरी सतह में कोरोना वायरस फंस जाता है.

तो आखिर में हम आपसे यही कहना चाहते हैं कि कोरोना से डरिए लेकिन अखबार से नहीं. अभी तक अखबार द्वारा कोरोना फैलने का कोई भी मामला सामने नहीं आया है. और अखबार तो हमारे सच्चे दोस्त हैं. इनके कॉन्टेंट, विचारधारा पर भले ही आप असहमत हों लेकिन आज भी खबर के लिए सबसे भरोसेमंद कुछ है तो वो अखबार ही हैं.