केरल के पद्मनाभ मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ये बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने केरल के प्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर को लेकर अपना एक फैसला सुनाया है जिसमें त्रावणकोर के शाही परिवार को ही इस मंदिर का ट्रस्टी बरकरार रखा है. इस फैसले के मुताबिक एक प्रशासनिक समिति बनाई जाएगी जो मंदिर से जुड़े मामलों का प्रबंधन करेगी. साथ ही इस मंदिर के कथित तौर पर रहस्यमयी कमरे को खोलने का फैसला इसी प्रशासनिक समिति पर छोड़ दिया है. आपको बता दें कि इस मंदिर से जुड़ी हजारों किवदंतियां हैं जो सोशल मीडिया पर मौजूद हैं लेकिन इनकी सच्चाई क्या है, कोई नहीं जानता.

बेहद चर्चित रहा ये मंदिर केरल की राजधानी तिरुवंतपुरम में है और त्रावणकोर रियासत के राजाओं ने लंबे वक्त तक यहां राज किया था. आजादी के बाद त्रावणकोर के आखिरी शासक चिथिरा थिरूनल के पास इस मंदिर के प्रशासन का अधिकार था. 1991 में उनकी मृत्यु के बाद उनके भाई उत्तरादम वर्मा को मंदिर की कस्टडी मिली. 2007 में उन्होंने मंदिर के खजाने को शाही परिवार की संपत्ति बताते हुए इस पर दावा किया.

इसके बाद कई लोगों ने कोर्ट में मामला दायर कर दिया था. 2011 में केरल के हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि मंदिर के नियंत्रण को लेकर एक ट्रस्ट बनाया जाए. जब इस फैसले के खिलाफ शाही परिवार कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने खजाने वाले कमरों को खोलने का आदेश दिया और कहा कि जो सामान मिले उसकी लिस्ट बनाई जाए. साल 2016 में यहां से काफी सोना भी चोरी हो गया था जिसकी कीमत तब 186 करोड़ बताई गई थी.

ऐसा माना जाता है कि 10वीं शताब्दी में इस मंदिर को बनवाया गया था, हालांकि कुछ जगहों पर मंदिर को 16वीं शताब्दी का भी बताया गया है. इंटरनेट पर सर्च करने से पता चलता है कि 1750 में त्रावणकोर के एक योद्धा मार्तंड वर्मा ने आसपास के इलाकों को जीत कर संपदा बढ़ाई. त्रावणकोर के शासकों ने शासन को दैवीय स्वीकृति दिलाने के लिए अपना राज्य भगवान को समर्पित कर दिया था. उन्होंने भगवान को ही राजा घोषित कर दिया था.

माना जाता है कि मार्तंड वर्मा ने पुर्तगाली समुद्री बेड़े और उसके खजाने पर भी कब्जा कर लिया था. यूरोपीय लोग मसालों खासकर काली मिर्च के लिए भारत आते थे. त्रावणकोर ने इस व्यवसाय पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया था. मसालों के व्यापार से राज्य को काफी फायदा होता था और इस संपत्ति को इस मंदिर में रख दिया जाता था. सही मायनों में तो पूरे राज्य की संपत्ति को ही मंदिर में रखा गया था.

यह मंदिर एक ऐसे इलाके में बना हुआ है जहां कभी कोई विदेशी हमला नहीं हुआ. 1790 में टीपू सुल्तान ने मंदिर पर कब्जे की कोशिश की थी लेकिन कोच्चि में उसे हार का सामना करना पड़ा था. टीपू से पहले भी इस मंदिर पर हमले और कब्जे की कोशिशें की गई थीं लेकिन यह कोशिशें कभी कामयाब नहीं हो पाईं. मंदिर के खजाने और वैभव की कहानियां दूर-दूर तक फैली हुई थीं और आक्रमणकारी इस पर कब्जा करना चाहते थे.

2007 में एक पूर्व आईपीएस अधिकारी सुंदरराजन ने एक याचिका कोर्ट में दाखिल कर राज परिवार के अधिकार को चुनौती दी. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने तहखाने खोलकर खजाने का ब्यौरा तैयार करने को कहा. 27 जून 2011 को तहखाने खोलने का काम शुरू किया गया. तहखाने खुले तो लोगों की आंखे खुली रह गई. पांच तहखानों में करीब एक लाख करोड़ की संपत्ति निकली जबकि एक तहखाना अभी भी नहीं खोला गया है.

कहा जाता है कि जो तहखाना बंद है उसमें लाखों करोड़ का खजाना हो सकता है. माना जा रहा है कि इस तहखाने में जितना खजाना है वह इस पूरे खजाने से बड़ा है. हालांकि कई जगहों पर इस खजाने को अभिशप्त माना गया है. कोर्ट में भी इसको लेकर दावा किया गया था कि इस खजाने को नहीं खोला जाए अन्यथा बुरा हो सकता है. यूट्यूब पर कई ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिनमें दावा किया गया है कि इस सातवें द्वार को अभिमंत्रित किया गया है और इसके खुलना दुनिया के लिए बुरा हो सकता है.

कई थ्योरी ऐसी हैं जिनमें ये भी दावा किया गया है कि इस दरवाजे के पीछे दूसरी दुनिया का रास्ता है या फिर सीधे ईश्वर से कॉन्टेक्ट करने की तकनीक मौजूद है. इस दरवाजे के पीछे क्या है ये तो कोई नहीं जानता लेकिन एक बात तो साफ है कि इस वॉल्ट में कुछ बेहद खास चीज मौजूद है जिसको दुनिया से छुपाकर रखना ही तत्कालीन शासकों ने ठीक समझा था. अब ये खास चीज अनमोल खजाना है या फिर कुछ और ये तो तभी पता चलेगा जब ये दरवाजा खोला जाएगा.