यूपी को हिला कर रख देने वाले इस कांड ने सिस्टम पर खड़े किए सवाल

यूपी के अपराध और विकास दुबे को लेकर पिछले कुछ दिनों में आपने कई वीडियो देख डाले होंगे, दर्जनों बातें आप जान चुके होंगे और पचासों चीजें आप सोच चुके होंगे. टीवी चैनल कई बहस इस मुद्दे पर दिखा चुके हैं और अखबार भी रोजाना इस मुद्दे पर खबरें छाप रहे हैं. विपक्षी दल सरकार पर निशाना साध रहे हैं, पुलिस और प्रशासन अपना काम कर रहे हैं और जनता हमेशा की तरह चटखारे लेकर बातें कर रही है. लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसा है जो हमारी नजरों के सामने होते हुए भी अदृश्य है.

इस केस को लेकर पहला सवाल ये है कि क्या यूपी की खुफिया एजेंसियां बेकार हो चुकी हैं? अब वक्त आ चुका है जब एलआईयू की भूमिका पर सवाल उठाया जाना चाहिए और उसकी प्रासंगिकता को लेकर चर्चा की जानी चाहिए. अगर एक अपराधी और उसका गैंग गलत हरकतें कर रहा है, हथियार जमा कर रहा है, सरकार और पुलिस के इकबाल को चुनौती दे रहा है तो उसके बारे में सही और सटीक जानकारी पुलिस और प्रशासन के पास क्यों नहीं थी? साफ है कि यूपी पुलिस जिस जाल के जरिए अपराधियों को पकड़ती है अब उस जाल में छेद हो चुके हैं.

दूसरा सवाल ये है कि क्या 2020 में भी अपराधी गैंग बनाकर गलत हरकतों को अंजाम दे पा रहे हैं? दरअसल अपराध कई तरह के होते हैं. कई बार अपराध गुस्से और गलती से हो जाते हैं और कई बार अपराध जान बूझ कर गिरोह बनाकर किए जाते हैं. पिछले करीब डेढ दशक से पुलिस साधन संपन्न हो चुकी है. तकनीक की कोई कमी नहीं है और यूपी की वर्तमान सरकार ने तो पुलिस के हाथ खोल देने का भी दावा किया है. इसके बावजूद अगर अपराधी गैंग बनाकर संगठित होकर समाज के खिलाफ अपराध कर पा रहे हैं तो गलती कहां हो रही है?

तीसरा सवाल ये है कि क्या सिस्टम के कारिंदे अपराधियों की मदद कर रहे हैं? ये सवाल बहुत जरूरी है और इसका जवाब तलाश करना सरकार के लिए बहुत जरूरी भी है. अगर सिस्टम से जुड़े लोग ऐसे अपराधियों के लिए भी काम कर रहे हैं तो सरकार को ना केवल सतर्क रहने की जरूरत है बल्कि ऐसे लोगों को छांटने और उन्हें सख्त सजा देने की भी जरूरत है. ये वो लोग होते हैं जो सिस्टम को दीमक की तरह खा रहे हैं. सरकार के पैसे पर पलने वाले ये लोग अगर सरकारी थाली में ही छेद कर रहे हैं तो ये वक्त जाग जाने का है अन्यथा देर हो जाएगी.

चौथा सवाल ये है कि विकास दुबे और इसके जैसे अपराधियों को ताकत कहां से मिलती है? इस बात को समझ लीजिएगा क्योंकि ये सबसे बड़ा सवाल है. आखिर किसी अपराधी को ये ताकत कहां से मिल जाती है कि वो आसानी से कत्ल या यूं कहें कि नरसंहार जैसे कदम उठाता है? पुलिस और कानून का डर आखिर ऐसे अपराधियों को क्यों नहीं सताता? जहां जनता चालान तक से डर जाती है वहां ये अपराधी पुलिसवालों को कत्ल करने से पहले सोचता तक नहीं? आखिर ऐसा कैसे हो सकता है? साफ है कि कहीं ना कहीं से ऐसे अपराधियों को संरक्षण मिलता रहा है.

सवाल और भी कई हो सकते हैं. जनता का काम है सिस्टम से सवाल करना. अगर आप लोकतंत्र में यकीन रखते हैं तो सवाल जरूर करें, अगर आप कानून के राज में भरोसा रखते हैं तो सवाल जरूर करें और अगर आप बतौर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझते हैं तो सवाल जरूर करें.