मजबूरी की महाबंदी पर सियासत क्यों? पढ़ें आशीष कुमार पाण्डेय का लेख

Photo by cottonbro on Pexels.com

वैश्विक महामारी कोरोना से एक तरफ पूरा देश संघर्ष कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ कुछ सियासतदां इस स्थिति को राजनीतिक रोटियां सेंकने का मौका समझ रहे हैं. देश की कई राज्य सरकारों ने अपने अपने तरीके से संक्रमण काल की आग को हवा देने का काम किया.

नजीर के तौर पर राजस्थान, पश्चिम बंगाल सरकारों की कार्यप्रणाली देखी जा सकती है. राजस्थान में तो ऐसा लगा कि वहां की सियासी सोच को भी कोरोना ने संक्रमित कर दिया है. जिसके प्रभाव में राजस्थान की पूरी व्यवस्था चरमरती दिखी. संक्रमण से बचाने के लिए जिस तरह क्वारंटीन और सोशल डिस्टेंसिंग का सहारा लिया जा रहा है. ठीक वैसे ही राजस्थान सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों को ही कोरोना मान लिया और बचाव के लिए पूरा सिस्टम ही संवेदनहीन रूपी क्वारंटीन का लबादा ओढ़ने को उतावला हो उठा.

साथ ही सरकार ने अपने ही प्रवासी लोगों से दूरी बना कर सोशल डिस्टेंसिंग की कवायद शुरू कर दी. कोरोना काल में अशोक गहलोत सरकार की नाकाफी योजनाओं व दूरदर्शिता के आभाव का नतीजा केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों में रह रहे राजस्थान के लोगों को भी भुगतना पड़ा. देश में एक के बाद एक लॉकडाउन बढ़ता गया. तो दूसरी तरफ प्रवासियों की राजस्थान नहीं पहुंच पाने की टीस भी बढ़ती चली गई.

घर नहीं पहुंच पाने वाले प्रवासियों के वेदना को हमने प्रदेश सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया भी, लेकिन सत्तासुख में रमी प्रदेश सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों की गंभीरता को भी नहीं समझा. राज्य सरकार कभी 4 हजार बसें होने की बात करती है तो कभी ट्रेनें चालू कराने की, लेकिन करती कुछ नहीं है. आलम यह है कि राज्य सरकार ने कुछ ही ट्रेनों चलाने की अनुमति दी है.

चाहिए तो था कि सत्ताधारी उन प्रवासियों को बेहतर सुविधा देकर उनके घावों पर मरहम लगाते. प्रदेश के मुखिया होने के नाते अशोक गहलोत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीख लेते हुए अपने लोगों को वापस बुलाने का व्यापक इंतजाम करते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालात यह हुई कि दूसरे प्रदेश में रहने वाले राजस्थान के प्रवासियों को लौटने का इंतजार लगातार बढ़ता रहा.

कामगारों व श्रमिकों के देखभाल, जरूरमंदों के घर वापसी आदि समस्याओं पर राज्य सरकार की ठोस कार्यनीति नहीं दिखी. जो थोड़ी बहुत योजना धरातल पर उतरी तो उसमें भी नैतिक शुचिता का पालन नहीं हुआ. प्रदेश सरकार के इशारे पर भारतीय जनता पार्टी के सांसदों और मंत्रियों को निशाना बनाया गया कि वह केंद्र में राज्य के प्रतिनिधि हैं और उन्हें केंद्र से मदद लेनी चाहिए. जहां राज्य सरकार को फ्रंट फुट पर रहना चाहिए था वहां वह पर्दे के पीछे छुप कर ओछी राजनीती कर रही है.

गहलोत सरकार ने दूसरे राज्यों में रहने वाले राजस्थान के प्रवासी मजदूरों के लिए पास जारी किया. उसके बाद भी हजारों कामगार कई दिनों तक बॉर्डर पर फंसे दिखे. हद तो तब हुई जब उन जिम्मेदार अधिकारियों के मोबाइल बंद मिले, जिनके भरोसे प्रवासियों को वापस बुलाने की येाजना बनी. अपने घर लौटने की चाह में हजारों किलोमीटर से आने वालों को प्रदेश की सीमा के भीतर भी नहीं दिया गया. जिससे यह साफ हो गया कि प्रदेश सरकार के पूरे सिस्टम में ही जवाबदेही और संवेदना का अभाव है.

होना यह चाहिए था कि इन चुनौतियों को अवसर में बदला जाए, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. केंद्र सरकार की पहल पर रेलवे से बात करके हजारों प्रवासियों के राजस्थान लौटने का मार्ग खोला गया. इन सबके बीच राज्य सरकार को हर तरह से सहयोग व सहायता करने का आश्वासन भी दिया गया. राजनीति अपनी जगह है लेकिन ऐसे कठिन समय में केंद्र और राज्य सरकार को साथ मिलकर लोगों की परेशानियां दूर करने चाहिए थीं. आज राजस्थान में काबिज अशोक गहलोत को यह समझना होगा कि मजबूरी की इस महाबंदी में सियासत करना उनके लिए किसी भी तरह से फायदेमंद साबित नहीं होगा.