कोरोना वायरस: वो “न-मुराद” ”बे-रहम” जिसने विज्ञान-तकनीक की चूलें हिला दीं

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वे-वक्त घर पहुंचे मेहमान को सौ बहाने बनाकर टहलाया जा सकता है. तमाम बहाने बनाकर वे-वक्त घर में आ धमके मेहमान से पीछा छुड़ाने के बहुतेरे उपाय किताबों, किस्से कहानियों, कहावतों में मौजूद हैं. इस न-मुराद करोना (कोरोना) को कैसे और कौन समझाये? किसी की कोई बात या कोई बहाना सुनने को राजी नहीं. जो उपाय बताओ उसके एकदम उलट असर दिखा देता है.

कोरोना का ही आलम है जिसने, इंसान पर नींद की गोली का असर भी “बे-असर” कर डाला है. मतलब कोरोना के भय के चलते नींद की गोली लेकर भी इंसान को नींद नहीं आ रही है. इस भय से कि न मालूम मुआ (कोरोना) कब चुपचाप धीरे से बदन में किस रास्ते से सरक आये? इन तमाम झंझटों के बाद भी नींद से बोझिल आंखों संग जिधर करवट बदलो, उधर कोरोना भले दिखाई न दे रहा हो. उसकी अदृश्य सी “फुंकार” तन बदन को सिहराने और रोंगटों को खड़ा करने के लिए काफी है.

बच्चों की कापी किताब पेंसिल से लेकर. रसोई घर में पड़े झूठे बरतनों में. घर के कोने में महीनों से धूल से अटे-पटे पड़े रद्दी वाले अखबारों के बंडल में. घर के कोने में बूढ़ी अम्मा द्वारा, महीनों से बिना इस्तेमाल किये हुए “बाकर” में. मार्च महीने से बंद पड़ी अलमारी की तिजोरी के ताले पर. कुत्ता बिल्ली भगाने-मारने को फ्लैट के कोने में रखे धूल सने डंडे पर. जहां नजर जाती है वहीं, जी-फुंकाऊं मरे इस कोरोना के चिपके होने के अहसास से कंपकपी बंध जाती है.

रही सही हिम्मत, 24 घंटे कोरोना को लेकर चिल्लपों मचा रहे ठाली बैठे हिंदुस्तानी न्यूज चैनल फ़ना कर दे रहे हैं. कोरोना से देश में मरने और बीमार होने वाले लोगों के मनगढ़ंत आंकड़ों में घर के भीतर बंद बैठे इंसान की गर्दन जबरिया ही घुसा-डुबो कर. जैसे ही टीवी न्यूज चैनल खोलें. सामने स्क्रीन पर न्यूज एंकर के बजाये कोरोना चमगादड़ सा उल्टा सीधा लटका दिखाई देता है.

SANJEEV KUMAR SINGH CHAUHAN
संजीव कुमार सिंह चौहान

बाकी बची उम्र गुजार पाने के लिए थोड़ी झूठी-सच्ची जो भी मानिये समझिये, जीने की उम्मीद मिलती है तो, भारतीय न्यूज चैनलों पर इन दिनों सुबह से शाम तक नंग-धड़ंग बैठे बाबा “वैद्य” जी के भाषण से. जो बताते हैं कि, इंसान कोरोना का काम-तमाम करके खुद को महफूज कैसे रख सकता है? बाबा की ब-जुबानी, देसी कसरत यानि योगा से कोरोना के पांव उखड़ जाते हैं. मरता क्या नहीं करता. कोरोना की काली नजर से बचने को बाबा के कहे मुताबिक, हम भी भीड़ भरी दिल्ली के 450 स्क्वॉयर फुट के दमघोंटू फ्लैट में देसी कसरत कर बैठे. कोरोना तो नहीं हुआ, रीढ़ की हड्डी कहीं अचानक फंस गयी है. फिलहाल कोरोना के “काल” को भूलकर रीढ़ की हड्डी पर चूना-हल्दी गरम करके “चोटमार” (बेशरम के पत्ते) के पत्तों में बंधवा कर एक महीने से सिकाई करा रहे हैं.

अब इसके आगे सुनिये. इन बाबा वैद्य ने भी जब से कोरोना से बचाव की आयुर्वेदिक गोली (दवाई) बनाई है, तब से वे भी फजीहत में फंस गये हैं. एक गोली ने वैद्य बाबा की जितनी छीछालेदर कराई है, उतनी छीछालेदर इनकी सन् 2011-2012 में दिल्ली के रामलीला मैदान में भी नहीं हुई थी. लिहाजा इन हालातों में इनकी बातों से आने वाली जिंदगी जी लेने की हिम्मत भी अब तो जबाब दे चुकी है. इसका नमूना हम खुद हैं. जो बाबा के कहे मुताबिक कोरोना से बचाव के फेर में देसी कसरत यानि योगा कर बैठे. अब कमर यानि रीढ़ की हड्डी पर महीने भर से फ्लैट में बंद पड़े चूना-हल्दी की पट्टी करा रहे हैं. मतलब नमाज पढ़ने चले थे, रोजा गले पड़ गये.

ऐसे में मन में बस यह सवाल रह-रहकर “कै-उल्टियाँ” कर रहा है कि, “रे कोरोना जैसे तू आता है भला वैसे भी कोई आता है? तुझे आना था तो कम से कम कुछ तो इशारा कर दिया होता. दबे पांव आया और देश के सफेदपोशों-नंबरदारों के अलावा बाकी सब पर सवारी “गांठने” लगा. तुझे अपनी ताकत का अहसास ही कराना था तो पहले सरकारी “माल-पानी” खाये पीये और बिना डकार लिये लेटे-बैठे “कुर्सिधारियों” पर ही सवारी गांठ लेता. हमसे गरीब तो हमेशा तेरी हद में थे. जब चाहता सब्जी मंडी से लेकर खेत-खलिहान, गली-मुहल्ले, पनवाड़ी नाई, किसी की भी दुकान या दर पर दबोच लेता. थोड़ा वक्त अगर तूने दे दिया होता तो, इतने में कम से कम हमारे जैसे अदना से लेखक-पत्रकार, बुद्धिजीवी तबके के गरीब खुद को तुझसे जूझने लायक तो बना लेते.

कोरोना भी मगर कोरोना है. जमाने को उसे समझाना था कि, मुझसे ज्यादा भ्रष्ट जिद्दी और खतरनाक हाल-फिलहाल तो इंसानी दुनिया जहां में दूसरा कोई नहीं हो सकता है. सो कोरोना समझाने में कामयाब रहा. अमेरिका, चीन, भारत, पाकिस्तान, फ्रांस, रुस, ब्रिटेन. जिधर नजर डालिये हर कोने में कोरोना मौजूद है. दुनिया के हर देश के पास दुश्मन को पानी पिलाने के लिए मौजूद साज-ओ-सामान, कोरोना से भयभीत हो “अंडरग्राउंड” पड़ा, अपनी ताकत को नपुसंक हुआ देख सिसक-बिलख रहा है. बेबसी के आलम में. क्योंकि कोरोना ने सबकी ताकत को “हिरन” कर दिया है.

कोरोना का कोहराम ही एक ऐसा कोहराम है, जिसकी आवाज में हर आवाज का “दम” घुट चुका है. लोग चीख चिल्ला बिलबिला रहे हैं. कोरोना ने मगर सबके कान बंद कर दिये हैं. ताकि किसी की चीख-चिल्लाहट किसी के कानों तक पहुंच ही न सके. बहरहाल जो भी हो. एक उस कोरोना ने जिसके चाबुक की मार पड़ तो सब की पीठ पर एक सी रही है. मगर आवाज किसी के कान को नहीं सुनाई दे रही है. मौजूदा विज्ञान के वक्त में इस बात का अहसास तो करा ही दिया है कि, इंसान की वैज्ञानिक दुनिया से आगे भी एक दुनिया मौजूद है. जहां इंसान खुद को बेबस लाचार और नपुंसक होता पाता है. देख रहा है, लेकिन इंसान की बेबसी की आलम देखिये कि, कोरोना से जीतने के लिए उसके पास न कोई दवा है न हकीम. शायद इसीलिए साइंस और तकनीक के जरिये चांद पर घर बनाने की गलफहमी पाले बैठे आज कोरोना के सामने लाचार इंसान के पास यह कहने के सिवाये कुछ नहीं बचा है….”अरे कोरोना भला ऐसे भी कोई आता है जैसे तू आया!”

(इस लेख को वरिष्ठ पत्रकार संजीव कुमार सिंह चौहान ने लिखा है. संजीव आज तक, स्टार न्यूज, आईएएनएस जैसे हिंदुस्तान के तमाम मशहूर मीडिया हाउसों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं.)