भरतपुर के राजा मानसिंह हत्याकांड में सजा पर “चिल्लपों” क्यों?

जिस दिन से “मी-लार्ड” ने भरतपुर के राजा मानसिंह तीहरे हत्याकांड में सजा सुनाई है देश के गली-गलियारों में बाहियाद चर्चाओं का भूचाल आया है. जितनी जुबानें उससे ज्यादा तमाम तरह की बेमतलब की बातें और बहसें….मैं इन सबसे इतर सोच रहा हूं. सोच रहा हूं कि, अदालत ने 35 साल बाद ही सही सजा के ऐलान की तारीख और सजा मुकर्रर कर दी. इस जर्रानवाजी के लिए किन अल्फाजों का हिंदुस्तानी अदालत का शुक्रिया अदा करूं?

सजा 35 साल बाद हुई. सजा में यह नहीं हुआ. सजा में वो और ऐसे होना चाहिए था. सजा इतने ज्यादा बिलंब से हुई कि, अब कई मुजरिम निपट चुके हैं बिना अदालती सजा भोगे ही. जो बचे हैं उनके पांव कब्र में लटक रहे हैं. अब सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ मुजरिम पक्ष अपनी गर्दन बचाने को हाईकोर्ट का रुख करेगा….आदि-आदि…. और न जाने कितने और कौन कौन से तकिया कलाम….जो किताबों में भरे पड़ें हैं. सब के सब राजा मानसिंह तिहरे हत्याकांड के ऊपर ला पटके हैं.

सच पूछिये तो देश की हजारों अदालतों में आज भी कई दशक से फाइलों में दफन उन लाखों मुकदमों के बारे में पूछिये, जिनका आज भी कोई पुरसाहाल नहीं है. पीढ़ियाँ बदल चुकी हैं. जज एक के बाद एक रिटायर हो चुके हैं. अदालतों की इमारत बदल चुकी हैं. मामलों से संबंधित लाखों पीड़ित और गवाह मर-खप चुके हैं. अगर कुछ नहीं बदला है तो सिर्फ इन लंबित मुकदमों की फाइलों के फट चुके कवर. उनके अंदर 40-50 साल पहले दर्ज दस्तावेज (जो अब जर्जर और पीले पड़ चुके होंगे). इन फाइलों में दर्ज अगर कुछ नहीं बदला है तो व होंगी इनमें जमाने पहले दर्ज इबारतें. मुलजिमान, गवाहन, पीड़ित और मर चुके लोगों के नाम पते.

इन हालातों में जरा विचार कीजिये कि राजा मानसिंह हत्याकांड में 35 साल बाद ही सही. फैसला और सजा होना क्या किसी अजूबे से कम है. बहुत बड़ी और आसानी से विश्वास न करने वाली बात है. हमें और आपको निसंकोच सोचना होगा कि, चलो 35 साल बाद ही सही. कम से कम एक अदद कोई मुकदमा कानून की देहरी पर “अकाल” या “बे-मौत” मरने से तो बचा लिया गया. 35 साल बाद ही फैसला सुनाकर. अगर इस मामले में 35 साल बाद अब या फिर आगे भी अनगिनत साल तलक अदालत फैसला नहीं सुनाती तो भला कानून का कोई क्या बिगाड़ लेता? या यूं कहें कि 35 साल तक यह मामला एक अदद फैसले के इंतजार में कानून की देहरी पर फाइलों में बंद पड़ा लावारिस सा सिसकता रहा था, तो कौन सा मैने या किसी और ने इस मुकदमें कुछ बड़ा कर-धर लिया.

SANJEEV KUMAR SINGH CHAUHAN
संजीव कुमार सिंह चौहान

मतलब साफ है कि अदालत, अदालत होती है. वहां हमारी आपकी या फिर किसी व्यक्ति विशेष की कोई राय शुमारी मायने नहीं रखती है. अदालत में वही और तभी सब कुछ होता है, जब “मी-लॉर्ड” का मन और आत्मा जागृत होती है. हिंदुस्तानी अदालतों में न इसके आगे कुछ होता है. न इसके पीछे या दायें-बायें. मतलब आप पीड़ित हैं या फिर मुजरिम. इस सबसे भारतीय कानून पर कोई फर्क नहीं पड़ता. विचारणीय बिंदु यह है कि अदालत के पास किसी फैसले को सुनाने के लिए वक्त कब मुहैया हो पाये?

गड़े मुर्दे जितने उखाड़ना चाहें, उखड़ते रहेंगे. यह सिर्फ वक्त जाया करने के और कुछ नहीं है. मुद्दा है कि यही राजा मान सिंह तिहरा हत्याकांड जब 35 साल से कानून की देहरी पर पड़ा एक अदद फैसले के इंतजार में बेहाली के आलम में “बिलबिला” रहा था, तब आज के वे ठेकेदार कहां थे? जो अब फैसला आने के बाद, इस फैसले में देरी पर बेसुरा राग अलाप रहे हैं. तरह तरह का ज्ञान बांट रहे हैं. मसलन, फैसले में तीन दशक लग गये. तमाम मुजरिम मर-खप चुके हैं. जो जिंदा बचे हैं, उनमें से भी अधिकांश के पांव कब्र-शमशान में लटके हैं.

अरे भाई अब फैसला आने पर आप इन सवालों की फुटबॉल से क्यों खेल रहे हैं? अब तो शुक्रिया अदा करिये….कि देर आयद-दुरुस्त आयद….35 साल बाद ही सही फैसला आया. सजा मुकर्रर तो की गयी. वरना 35 साल तक जब किसी अदालत ने हत्यारे पुलिस वालों को “हत्यारा” लिखने की हिम्मत नहीं दिखाई. तो फिर अब जब हत्यारों को हत्यारा करार देकर “कानून ने उन्हें मुजरिम” करार ही दिया है, तो फिर बाहियाद की बाकी बेईमान बकवास सिर्फ और सिर्फ “कोरी-बकवास” से ज्यादा कुछ नहीं. इस बकवास को विराम भी, “बकवास” करने वालों को ही लगाना होगा. यह सोचकर कि हम हिंदुस्तान में रह रहे हैं. हिंदुस्तानी कानून की मानना और सुनना, हमारी जिम्मेदारी है. उसके खिलाफ जाने की जो जुर्रत करेगा, सो कानून के खेत में “जोत” दिया जायेगा.

(इस लेख को वरिष्ठ पत्रकार संजीव कुमार सिंह चौहान ने लिखा है. संजीव आजतक, स्टार न्यूज, आईएएनएस जैसे हिंदुस्तान के तमाम मशहूर मीडिया हाउस में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं)